April 16, 2024

जल संसाधन विभाग में जाँच की कोई प्रक्रिया ही नहीं

जल संसाधन विभाग में फर्जी कार्याे को तरजीह देकर आये दिन जो लाखों की हेराफेरी करते रहे, उन भ्रष्ट अधिकारियों को उच्च अधिकारियों द्वारा कैसे संरक्षण दिया गया जिससे उनकी विश्वसनीयता तो समाप्त हो ही जाती है, और सभी प्रकार के समायोजनों में उनकी हिस्सेदारी भी उजागर हो जाती है। साथ ही शासन के नियम कायदों को भी गंदीनाली में फेंक कर मिली भगत के माध्यम से स्वार्थ सिद्व को अपना लिया जाता है ।
अगर सत्यता के साथ आज भी देखा जाय तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जल संसाधन विभाग में नीचे से उपर तक जेबें भरने की जो
कर्तव्य परायणता दिखाई गई उसका सिरमौर रहा है आज का कोंडागांव जिला, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है पहले अभियंता रहे, आगे प्रमुख अभियंता बने” एच.आर.कुठारे” और वर्तमान में पदस्थ है प्रभारी मुख्य अभियंता आर. के. नगरिया जिन्होने पुनः एक बार बस्तर के कोंडागांव जिले में भ्रष्टाचार की बहार ला दी ।
और संभवतः यह पहले अधि कारी होगें जो बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में पढ़े लिखे क्योंकि इनके ईमानदार पिता यहां राजस्व विभाग में सर्विस कर चुके है और उनका बेटा बस्तर का शोषण करने और कराने में सभी से अग्रणी बन बैठा !

जगदलपुर /- पहले कोंडागांव क्षेत्र में उसके बाद जिला बनने पर जल संसाधन विभाग का भ्रष्टाचार अनवरत् जारी रहा । पहले उद्वहन सिचाई योजनायें समायोजन

वर्तमान में इन तीनों के पास है

जल संसाधन विभाग की कमान….. श्री रविन्द्र चौबे (मंत्री)

श्री अन्बलगन पी                                (सचिव)

श्री इन्द्रजीत उइके                           ( प्रमुख अभियंता)

की भेंट चड़ी और उसी तरह व्यपवर्तन (डायवर्सन ) योजनाओं का हाल रहा और स्टापडेम एवं एनीकट में संभवतः पुरे राज्य में भ्रष्टाचार का सिरमौर बना रहा ।
बस्तर संभाग में डायवर्सन योजनायें लगभग 56 हैं जिसमें कोंडागांव में करीब 10 या 11 योजनाओं का निर्माण हुआ जो प्रारंभ में पूर्णतः सिंचाई करती रही पर आज एक दो को छोढ़कर सभी डायवर्सन जीरो पर आ गये हैं। यही हाल संभाग की समस्त उद्वहन सिंचाई
योजनाओं का है संभाग में करीब 35 के लगभग है। जिनसे लगभग 13 हजार एकड़ जमीन सिंचित होती थी पर इसे विंडबना ही समझे वर्तमान में यह सभी योजनाऐं 10 प्रतिशत भी सिंचाई देने में असमर्थ है। कोंडागांव में भी करोड़ो की लागत से 3 योजनायें संचालित की गई पर इनकी क्षमता भी जीरो की और बड़ रही है।
इसी तरह संभाग में करीब 2021 तक 130 एनीकट का निर्माण संपन्न हुआ जिनमें बहुत से आज पूरी तरह हवस्त हो चुके है कुछ के अवशेष भी नही बचे कुछ इतने पास बनाये गये कि एक दूसरे का पानी रोकते है कुछ बनना कही थे पर बनायें कहीं गये कुछ की ड्राइंग कुछ बनी पर बनाये कुछ और गये। इसमें सबसे आश्चर्य की बात यह भी है कि इन्द्रावती नदी बस्तर सीमा से चित्रकोट जल प्रपात तक की दूरी मात्र 55 कि.मी. है जिसमें 10 एनीकट बनाये गये। इनमें भी कई एनीकट ड्राइंग के अनुसार नहीं बने कुछ का रूका हुआ पानी इतना खराब हो जाता है कि मबेशी भी नही पीते इन एनीकटों में जल संसाधन विभाग ने 70 करोड़ से
अधिक की राशि खर्च की ।
कोंडागांव में लगभग 35 एनीकट बनें थे लेकिन आगे डायवर्सन और एनीकट मिलाकर 67 निमार्ण हुऐ इसमें कुछ पहली और कुछ दुसरी बरसात में ही बह गये। यहां तक की कोंडागांव के जोंदरापदर डायवर्सन का बैगर किसी काम का 70 लाख रूपया निकाल लिया गया था। जिसकी कोई जांच नही हुई । उलेखीनय है कि 18 वर्ष पूर्व कृषि और कृषकों के लाभ हेतु छत्तीसगढ में भारत शासन द्वारा एक योजना प्रारंभ की गई जिसका नाम था ष्ऐ.आई.बी.पी.ष् यानि त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम इस योजना के तहत राज्य में करीब 600 एनीकट निर्माण किये गये इसके लिये केन्द्र सरकार ने 25 अरब की राशि उपलब्ध कराई थी जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा बस्तर खर्च हुआ जिसमें कोंडागांव में पदस्थ एक प्रभारी कार्यपालन यं
अपने पांच वर्षाे के प्रभार में 141 करोड़ की राशि खर्च कर डाली जिसमें 62 करोड़ का सीमेंट खरीदना बताया गया तथा गिट्टी 35 करोड़ की खरीदी गई अगर इन कामों की किसी भी छोर से जांच कराई जाय तो 40 करोड़ का काम जमीन में नही आ पाया। ज्ञात हो कि यह पूरा घोटाला प्रभारी अभियंता ने नही किया बल्कि दो तत्कालीन अधिकारी की विशेष कृपा रही जो बराबर अपना हिस्सा लेने समयानुसार कोंडागांव आते रहे और अपना ईमान बेंचकर पूरा प्रक्षय देते रहे, इन भ्रष्टाचारियों के नाम इस प्रकार है प्रथम तत्कालीन प्रमुख अभियंता एच.आर. कुठारे दूसरे तत्कालीन गुणवत्ता नियंत्रक (बस्तर संभाग) कार्यपालन अभियंता आर. के. नगरिया जो वर्तमान में
प्रभारी मुख्य अभियंता बने हुये है और कुठारे साहव खा पी कर सेवा निवृत हो चुके है। देखिए इन्ही दोनों की देख-रेख में बने कोंडागांव के आज पाँच एनीकट बनने के बाद से पिछले आठ वर्षाे से ध्वस्त पड़े है जो इस प्रकार है।
1 मुण्डापारा एनिकेट
वि.खं. बड़े राजपूर लागत 3 करोड़ 22 लाख
88 हजार

2., कबोंगा एनीकट वि. खं. फरसगांव लागत 4 करोड़ 63 लाख 53 हजार

3, मैनपुर एनीकट वि. खं. बड़े राजपुर लागत 2 कड़ोड़ 77 लाख 48 हजार

4, कदमघाट एनीकट वि.खं. कोंडागांव लागत 2 करोड़ 20 लाख 36 हजार

5, लिमघाट एनीकट वि.खं. कोंडागांव लागत 3 करोड़ 23 लाख
इसी प्रकार बस्तर विकास खंण्ड के अर्न्तगत नारंगी नदी पर भी 1 करोड़ 85 लाख का एनीकट इन्ही तत्कालीन गुणवत्ता नियंत्रक और वर्तमान में मुख्य अभियंता का पदभार सम्हाले आर.के नगरिया की देखरेख में बना था जो पिछले 3 वर्षों में दो बार टूट चुका है, जिसकी बगैर गुणवत्ता जाँच के ओके रिपोर्ट देकर भुगतान भी किया गया था ।
जुलाई 2009 से अगस्त 2014 तक प्रभारी कार्यपालन अभियंता बने कोंडागांव के इस अधिकारी पर वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार राज्य शासन के आदेश अनुसार ही प्रभावशील माने जाते है। इस तरह इस अधि कारी ने अपने पाँच वर्ष की अबधि में 190 करोड़ के भुगतान किये निश्चित ही यह एक भारी गंभीर अनियमित्ता है?

नहीं की यहां तक कि वर्तमान में पूर्णरूप से हालात यह है कि न वन विभाग को स्थानीय ग्रामीणों से कोई लाभ है, और न ही इन ग्रामिणों को वन विभाग को । अगर यूं कहा जाय कि ग्रामिणों को वनों कि सुरक्षा का दायित्व बोध से जोड़ने कि कोई उनके लाभप्रद प्रकार की पहल की ही नहीं गई। न ही ग्रामीणों को प्रोत्साहित ह सव कभी लाखों करोड़ो के खाली जमीनों पर वष्क्षारोपण और आगे कभी उसकी देखरेख न होना और पौधो का सूख जाना अथवा कुछ ही दिनों में अवशेष भी शेष न रह जाना बस्तर में वन विभाग की जानी पहचानी विशेषता बन गई है । सबसे मजे की बात तो यह है इस विभाग में कार्याे का मूल्यांकन और भौतिक सत्यापन संभवतः होता ही नहीं। आज संभागीय मुख्यालय के जगदलपुर वन मण्डल को ही ले लें तो फर्जी निर्माण कार्य अवैध कटाई एवं कागजों में वक्षारोपण कर दिये गये। समानुसार इस प्रकार के उदाहरण सामने आते रहते है जैसे- शहर से 15-16 कि. मी. दूर माचकोट परिक्षेत्र में कुदंदी क्षेत्र के सुलियागुड़ा ग्राम के आसपास लगभग 10 वर्ष पूर्व मिश्रित पौधा रोपण किया था जिससे करीब 50 हेक्टेयर जमीन में 20 हजार के लगभग पौधे रोपे गये थे पर आज यहां जाकर देखो तो चार पांच पेड़ ही दिखते है। अतः यह कोई अतिशयोकित न समझे अगर यह कहा जाय कि यह सब खेल कागजों में ही किया गया था। यहां तक कि वक्षोरोपण के अनेक स्थान तो ऐसे भी है जिनमें हर आने वाले अधिकारी ने अपने-अपने ढंग से वष्क्षारोपण दर्शाते रहे और जेबें भरते रहे। इसी

तत्कालीन मुख्य अभियंता एच. आर. कुठारे के ही नेतृत्व में कोंडागांव 2010 में 4करोड़ का काम नदी नालों में भरी बरसात में कराया जो पूर्णतः फर्जी था इसमें मिट्टी के कार्य के मस्टरोल भी छापे गये, इसकी जांच को कुठारे ने मान्य कर ली पर जांच कभी नहीं की। इसी तरह बगैर सर्वे के तकनीकी स्वीकृतियां प्रदान की साथ ही ड्राइंग और एस्टीमेट मेल नहीं खाते थे फिर भी कार्य पूरे करने में माहिर रहा कोंडागांव का जल संसाधन विभाग। यही यहाँ की आर. आर. आर. योजना का हाल हुआ टेन्डर को बांट कर कारीब 13 करोड़ 5 लाख जिसमें कुठारे की कृपा के कारण टुकड़ो में का कार्य विवादों के घेरे में आ गया। सबसे आश्चर्य जनक बात तो यह है कि हालात आज भी वैसे ही हैं। इसी वर्ष 2022 में ही ओटेंगा में निमार्ण कराये जाने वाले 1 करोड़ 11 लाख के एनीकट में अग्रिम रिश्वत के रूप 24 लाख की मांग की गई थी। जिसकी 14 जून 2022 को 1 लाख 30 हजार किस्त के रूप में लेते कोंडागांव में पदस्थ ई. ई. आर. बी. सिंह एसडीओ आर.बी. चौरसिया एवं उपमंत्री डी.के. आर्या को एंटी क्रप्शन ब्यरो ने रंगे हाथों पकड़ा, और गिरफतार किया, कोर्ट में पेश किया जहाँ से इन तीनों को जेल भेजा गया। आगे जमानत पर बाहर है लेकिन कार्यवाही लंबित है।

आगे प्रभारी कार्य पालन अभियंता जो 2009 से 2014 तक रहे उन्हे निलंबित किया गया लेकिन वह लगभग 16 महीने तक गायब रहे। इसके बाद उन्होने 5 नवम्बर 2019 को सुकमा जिले में ज्वानिंग दी पर तीन वर्ष हो गये वे सुकमा 13 बार भी नहीं आये। यहाँ ये बात बहुत गंभीरता से उल्लेखनीय करना पड़ रही है कि जबसे छत्तीसगढ़ राज्य बना इन 22 वर्षों में अलग-अलग सरकारों के करीब 7 से 8 मंत्री इस विभाग में रह चुके है वहीं लगभग एक दर्जन से अधिक छत्तीसगढ़ शासन में पदास्थ सचिव एवं प्रमुख सचिव यह विभाग अपने पास रख चुके हैं। इसी तरह दर्जन भर प्रमुख अभियंता भी इस विभाग में रह चुके हैं।

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